''Wel-Come''

'गाँव से शहर की और शहर से गाँव की और मेरी यात्रा''....और इस यात्रा के ...'हंसी,खुसी और दर्द" के पल

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  • Monday, January 28, 2013
  • विजयपाल कुरडिया
  • लेबल: , ,
  • यह हर उस  ग्रामीण 'लड़के-लड़की' या 'आदमी -ओरत' की व्यथा हे, जो गाँव छोड़कर शहर में अपनों से दूर 'पढाई,रोजगार या अन्य किसी  कारण से जाता हे, गाँव लोटते समय उसके चेहेरे पर एक अलग ही 'ख़ुशी' होती हे और गाँव छोड़ते वक्त उसका चेहरा एक दम 'उदास' होता हे .....अपनों से मिलने और बिछड़ने की ख़ुशी और दर्द को 'टूटे-फूटे' शब्दों में जोड़ने का प्रयास किया हे ,देखिये जरा  
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    'शहर' से 'गाँव'
    पहुँचते-पहुँचते
    घड़ी  में
    '
    सात'
    बज गयी थी,
    और
    गली में
    '
    रात'
    सज गयी थी,


    घर में
    घुसते ही
    चल पड़ा
    दादाजी के कमरे में,
    क़दमों की
    आहट सुनकर 

    रजाई से
    उठ बेठे 'वो'
    अपनी
    अर्ध-शीत निद्रा से,
    शायद
    मेरे आने के
    इंतजार में ही थे,
    सिर पर
    हाथ  फेरकर
    बोले
    कंपकंपाती आवाज में
    ''
    गया तुं"
    मेने कहा 'हाँ'
    केसी तबियत हे आपकी ?
    तुजे देख लिया,
    अब ठीक हूँ ,

    (इस मामले में थोडा सोभाग्यशाली हूँ, सुक्रिया भगवान )
    तुं थक गया होगा
    खाना खा और
    आराम कर
    अन्दर जाने से पहेले
    बहार गेलेरी में ही
    दोनों 'सुभद्रावों' ने
    छीन  लिया 'थेला'
    और बोली
    इस बार
    क्या लाये हो,''कन्हेया'' ? हमारी खातिर
    मेने
    थेला उन्हें देते हुवे कहा
    '
    खुद ही देख लो'
    ''
    पापा-मम्मी'' दोनों
    रसोई घर में ही बेठे थे,
    पापा ने पुछा
    केसी चल रही हे पढाई ?
    कोई समस्या तो नहीं ?
    (
    अब उन्हें केसे समझावों  की पढाई से बड़ी समस्या भी कुछ होती हे भला...खेर छोड़ो )
    मेने कहा
    ठीक चल रही हे पापा,
    मम्मा ने पुछा
    वंहा खाना
    खाता भी हे या नहीं,
    दिन-दुना , रात चोगुना
    '
    दुबला'
    होता जा रहा हे,
    मजाक करने की
    तेरी आदत
    गयी नहीं अब तक,
    यह जब भी
    आता हे
    तुजे
    '
    दुबला' ही
    दिखाई देता हे
    बिच में ही
    पापा बोल पड़े ,
    (
    यह सबको  हंसाने के लिए पर्याप्त था )

    दुसरे  दिन 
    में मिला
    ताऊ से, ताई से
    भाभी से, भाई से
    सभी ने 'अपना'
    हालचाल पुछा  

    दोस्तों से मिलने का
    मजा ही कुछ अलग था
    हर कोई कुछ--कुछ
    पूछने-बताने में
    व्यस्त था,
    फिर उन्होंने
    पुछ ही लिया
    '
    ओं हीरो , ''इतना उदास क्यूँ बेठा हे''?
    मेने कहा,"यार यूँ ही,
    '
    दिल थोडा-थोडा भारी हे"
    उन्होंने फिर पुछा 
    क्या नाम हे उसका ?
    हमें बतावो, हम देख लेंगे

    (
    एक बार तो मन किया बता दूँ फिर याद आया कमीने कंही फेसबुक पर जाकर सचमुच देख ले )

    मेने भी
    बात को
    तुरंत 'मोड़' दिया
    खड़ा होकर,
    घर की और जाते हुवे
    '
    एक बात कही'
    और उन्हें
    उनके हाल पर 'छोड़' दिया

    "
    केसे कटेगी यह रात 'लाला'
    जाना हे कल प्रदेश .........!!!!!!!

    मेरी 'ख़ुशी' और मेरे ''दर्द'' में शामिल होने वाले दोस्तों का सुक्रिया  !!

    2 Comment Here:

    1. भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...
    2. सारा जहां हमारा, फिर देश क्या और परदेश क्या./.

    3. RAJIV MAHESHWARI said...
    4. good.....keep up

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